नई पीढ़ी के स्टार्टअप्स के IPO आकार सिकुड़ रहे हैं, बाजार की अस्थिरता से बदल रहे हैं मूल्यांकन मानक

भारतीय शेयर बाजार में हाल के महीनों में नई पीढ़ी के स्टार्टअप्स (new-age companies) के आईपीओ में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। कई कंपनियां अपने आईपीओ के आकार को घटा रही हैं और वैल्यूएशन को कम करके बाजार में उतर रही हैं। अस्थिर इक्विटी मार्केट और निवेशकों की बदलती अपेक्षाओं के कारण आईपीओ की कीमत तय करने के बेंचमार्क पूरी तरह से बदल गए हैं।

हालांकि भारत का आईपीओ बाजार सक्रिय बना हुआ है, लेकिन नई पीढ़ी की कंपनियां 2026 में सार्वजनिक बाजार से कुल मिलाकर लगभग 50,000 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बना रही हैं, जो पिछले साल के 35,000 करोड़ रुपये से काफी अधिक है। फिर भी, बाजार की चुनौतियों के चलते कंपनियां ज्यादा सतर्क हो गई हैं।

आईपीओ आकार घटने और वैल्यूएशन में कटौती के प्रमुख उदाहरण

  • अमागी लैब्स (Adtech फर्म): आईपीओ साइज को घटाया गया।
  • शैडोफैक्स (लॉजिस्टिक्स प्लेटफॉर्म): वैल्यूएशन को 7,400 करोड़ रुपये पर सेट किया गया।
  • फ्रैक्टल एनालिटिक्स (एनालिटिक्स कंपनी): आईपीओ साइज घटाकर 2,834 करोड़ रुपये कर दिया गया, जो पिछले प्राइवेट वैल्यूएशन से 26% कम था। कंपनी के सह-संस्थापक और ग्रुप सीईओ श्रीकांत वेलमकन्नी ने कहा कि पब्लिक मार्केट निवेशक एआई कंपनियों को प्राइवेट निवेशकों से अलग तरीके से देखते हैं, और उन्हें पारंपरिक टेक सर्विसेज फर्मों से अलग समझाने में समय लगेगा।
  • कैपिलरी टेक्नोलॉजीज (कस्टमर एंगेजमेंट फर्म): मजबूत कैश फ्लो के बावजूद आईपीओ साइज घटाया।
  • पाइन लैब्स (पेमेंट्स कंपनी): आईपीओ में 2.6 बिलियन डॉलर वैल्यूएशन तलाश रही है, जो पिछले प्राइवेट राउंड से लगभग आधी है।

ऐसा क्यों हो रहा है? मुख्य कारण

बाजार विशेषज्ञों और बैंकरों के अनुसार, पब्लिक मार्केट निवेशक अब ज्यादा रूढ़िवादी हो गए हैं। वे निम्नलिखित बातों पर ज्यादा जोर दे रहे हैं:

  • लाभप्रदता (profitability)
  • ऑपरेटिंग लेवरेज (operating leverage)
  • कैश फ्लो की दृश्यता (cash flow visibility)
  • मार्जिन प्रोफाइल और प्रतिस्पर्धी स्थिति

जब बाजार अस्थिर होता है और कई आईपीओ एक साथ आते हैं, तो निवेशक केवल उन कंपनियों को प्राथमिकता देते हैं जो कैटेगरी लीडर हों, मजबूत कमाई की संभावना दिखाएं और स्केल इकोनॉमिक्स साबित करें। हाल के लिस्टिंग अब नए आईपीओ के लिए रेफरेंस पॉइंट बन गए हैं, जिससे पिछले 12-18 महीनों की ट्रेडिंग और अर्निंग ट्रैजेक्टरी के आधार पर वैल्यूएशन तय हो रहे हैं।

अवेंडस कैपिटल के इक्विटी कैपिटल मार्केट्स हेड गौरव सूद का कहना है कि ग्रोथ को अब स्केल इकोनॉमिक्स, ऑपरेटिंग लेवरेज और कैश जेनरेशन के सबूत के साथ ही रिवॉर्ड किया जा रहा है। इससे प्राइवेट राउंड्स की तुलना में वैल्यूएशन कम हो जाते हैं। कंजर्वेटिव प्राइसिंग से क्लीन बुक मिलती है और लॉन्ग-टर्म विश्वसनीयता बनी रहती है।

आनंद राठी इन्वेस्टमेंट बैंकिंग के हेड (डिजिटल एंड न्यू एज बिजनेस) आकाश अग्रवाल बताते हैं कि यह रीसेट सिर्फ स्टार्टअप्स तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी तरह से सॉफ्ट मार्केट कंडीशंस के कारण है। समय के साथ निवेशकों को आईपीओ अप्रोच बेहतर समझ आएगी।

आगे क्या?

यह ट्रेंड बड़े आगामी आईपीओ जैसे PhonePe, Zepto, Oyo और Infra.Market पर भी असर डालेगा। निवेशक अब ज्यादा जांच-पड़ताल कर रहे हैं और कैश फ्लो, मार्जिन तथा पोजिशनिंग पर फोकस बढ़ा रहे हैं। फाउंडर्स मानते हैं कि कंजर्वेटिव प्राइसिंग के बावजूद मार्केट सेंटिमेंट से पूरी सुरक्षा नहीं मिलती।

कुल मिलाकर, भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम में यह बदलाव एक परिपक्वता की ओर इशारा करता है, जहां ग्रोथ की कहानी से ज्यादा लाभ और स्थिरता पर जोर दिया जा रहा है। 2026 में नए आईपीओ के लिए यह नया मानक सामान्य बन सकता है।

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