भारत के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के लंबे समय से चले आ रहे IPO (इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग) के रास्ते में एक बड़ी कानूनी बाधा दूर हो गई है। दिल्ली हाई कोर्ट ने 16 फरवरी 2026 को पूर्व न्यायिक अधिकारी के.सी. अग्रवाल द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें सेबी (SEBI) द्वारा जारी नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) को चुनौती दी गई थी।
जस्टिस जसमीत सिंह की एकल पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यह याचिका केवल NSE के IPO को रोकने या विलंबित करने के उद्देश्य से दायर की गई लगती है। कोर्ट ने माना कि याचिका का मुख्य मकसद देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज की लिस्टिंग प्रक्रिया में बाधा डालना था।
याचिका में क्या था दावा?
याचिकाकर्ता के.सी. अग्रवाल ने आरोप लगाया था कि NSE ने कॉर्पोरेट एक्शन एडजस्टमेंट फ्रेमवर्क का सही तरीके से पालन नहीं किया। उन्होंने दावा किया कि डिविडेंड जैसी घटनाओं में केवल कॉन्ट्रैक्ट प्राइस को एडजस्ट किया गया, लेकिन क्वांटिटी में बदलाव नहीं किया गया। साथ ही, डेरिवेटिव्स ट्रेडर्स के खातों से डायरेक्ट डेबिट किया गया, जिसमें याचिकाकर्ता का खाता भी शामिल था।
उनका कहना था कि डिविडेंड केवल शेयरधारकों को मिलना चाहिए और डेरिवेटिव पार्टिसिपेंट्स से रिकवरी के लिए कोई वैधानिक आधार नहीं है। उन्होंने SEBI की NOC को चुनौती देते हुए कहा कि रेगुलेटर ने NSE की कार्रवाई की स्वतंत्र जांच किए बिना मंजूरी दे दी। साथ ही, RTI आवेदनों को खारिज करने से पारदर्शिता की कमी का भी मुद्दा उठाया गया।
याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि NSE के IPO को तब तक रोक दिया जाए जब तक विस्तृत जांच न हो और निवेशकों के हितों तथा मार्केट की अखंडता की रक्षा न हो।
कोर्ट का फैसला और आधार
कोर्ट ने याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करने से इनकार कर दिया। जस्टिस जसमीत सिंह ने टिप्पणी की कि याचिका का उद्देश्य NSE IPO को “इंटरडिक्ट” (रोकना) करना था। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी उल्लेख है कि कोर्ट ने क्षेत्रीय अधिकारिता (jurisdiction) के आधार पर भी याचिका खारिज की, क्योंकि SEBI और NSE दोनों मुंबई में स्थित हैं और NOC मुंबई में जारी हुई थी। दिल्ली हाई कोर्ट को इस मामले में सुनवाई का अधिकार नहीं है।
इस फैसले से NSE के IPO की राह में एक महत्वपूर्ण कानूनी बाधा हट गई है।
NSE IPO की पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति
NSE ने पहली बार 2016 में IPO के लिए ड्राफ्ट पेपर SEBI के पास दाखिल किया था, लेकिन गवर्नेंस मुद्दों (जैसे को-लोकेशन केस, डार्क फाइबर आदि) के कारण प्रक्रिया रुक गई। पिछले साल NSE ने कई कानूनी मामलों को सुलझाया, जिसमें SEBI के साथ सेटलमेंट एप्लीकेशन दाखिल कीं और लगभग 1,300 करोड़ रुपये का प्रावधान किया।
30 जनवरी 2026 को SEBI ने NSE को NOC जारी किया, जिससे IPO प्रक्रिया फिर से शुरू करने की अनुमति मिली। NOC के बाद NSE ने IPO कमिटी का पुनर्गठन किया और रॉथ्सचाइल्ड एंड कंपनी को स्वतंत्र सलाहकार नियुक्त किया।
यह IPO पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) होगा, यानी कोई नया शेयर जारी नहीं होगा, केवल मौजूदा शेयरधारक अपने शेयर बेचेंगे।
NSE IPO के लिए क्या मायने?
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला NSE के लिए राहत की बात है। अब एक्सचेंज SEBI की मंजूरी के बाद DRHP (ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस) फाइल करने और IPO लॉन्च करने की तैयारी तेज कर सकता है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारत के पूंजी बाजार के लिए ऐतिहासिक कदम होगा, क्योंकि NSE देश का सबसे बड़ा और सबसे सक्रिय स्टॉक एक्सचेंज है।
यह फैसला निवेशकों के लिए भी सकारात्मक संकेत है, क्योंकि लंबे इंतजार के बाद NSE की लिस्टिंग से मार्केट में नई गतिविधि और पारदर्शिता बढ़ सकती है।
(नोट: यह लेख मूल खबर पर आधारित है और तथ्यों को सरल हिंदी में प्रस्तुत किया गया है। बाजार संबंधी निर्णय लेने से पहले विशेषज्ञ सलाह लें।)
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